दीपनिर्वाणगन्धं च सुहृद्वाक्यमरुन्धतीम् ।
न जिघ्रन्ति न शृण्वन्ति न पश्यन्ति गतायुषः ॥
जिनका जीवन समाप्त हो गया है, वे बुझे हुए दीपक की गंध नहीं देखते, मित्र की बातें नहीं सुनते और अरुंधति तारा नहीं देखते।
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