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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 71
यथायं मृगो मम बन्धुस्तथा भवानपि । मृगोऽब्रवीत् -- किमनेनोत्तरोत्तरेण । सर्वैरेकत्र विश्रम्भालापैः सुखिभिः स्थीयताम् । यतः । न कश्चित्कस्यचिन्मित्रं न कश्चित्कस्यचिद् रिपुः । व्यवहारेण मित्राणि जायन्ते रिपवस्तथा ॥
जैसे हिरण मेरा मित्र है, वैसे ही तुम भी हो। हिरण ने कहा--इस झगड़े से क्या फायदा? आइये हम सब मिलजुल कर मैत्रीपूर्ण वार्तालाप के साथ आनंदपूर्वक रहें। क्योंकि, कोई किसी का दोस्त या दुश्मन नहीं है। यह व्यवहार है जो दोस्त या दुश्मन बनाता है।
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