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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 54
अपरं च । भक्ष्यभक्षयोः प्रीतिर्विपत्तेरेव कारणं । शृगाला पाशबद्धोऽसौ मृगः काकेन रक्षितः ॥
और फिर भोजन और उसके खाने वाले के बीच मित्रता ही दुर्भाग्य का कारण है। जो हिरण जाल में फंस गया था, उसे सियार की चाल से एक कौवे ने बचाया था।
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