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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 41
रोगशोकपरीतापबन्धनव्यसनानि च । आत्मापराधवृक्षाणां फलान्येतानि देहिनाम् ॥
रोग, शोक, क्लेश, संयम और विपत्ति - ये मनुष्यों के किये हुए दोषों के रूप में वृक्षों के फल हैं।
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