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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 37
इति विचिन्त्य पक्षिणः सर्वे जालमादायोत्पतिताः । अनन्तरं स व्याधः सुदूराज्जालापहारकांस्तानवलोक्य पश्चाद्धावन्नचिन्तयत् -- संहतास्तु हरन्ति मे जालं मम विहङ्गमाः । यदा तु विवदिष्यन्ते वशमेष्यन्ति मे तदा ॥
इस प्रकार सलाह करके पक्षी जाल समेत उड़ गये। तब बहेलिए ने उन्हें दूर से जाल खींचते और उनके पीछे दौड़ते देखकर मन में सोचा, ये पक्षी मिलकर मेरा जाल खींच ले जा रहे हैं; परन्तु जब वे गिर पड़ेंगे (या आपस में बाहर हो जायेंगे), तो वे मेरे वश में हो जायेंगे।
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