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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 33
सम्पदि यस्य न हर्षो विपदि विषादो रणे च धीरत्वम् । तं भुवनत्रयतिलकं जनयति जननी सुतं विरलम् ॥
माता विरले ही ऐसे पुत्र को जन्म देती है, जो तीनों लोकों का भूषण हो, जो समृद्धि में प्रसन्न न हो, विपत्ति में दुःख अनुभव न करता हो तथा युद्ध में दृढ़ हो।
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