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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 30
तस्य तिरस्कारं श्रुत्वा चित्रग्रीव उवाच -- नायमस्य दोषः । यतः । आपदामापतन्तीनां हितोऽप्यायाति हेतुताम् । मातृजङ्घा हि वत्सस्य स्तम्भीभवति बन्धने ॥
अपनी निन्दा सुनकर चित्रग्रीव ने कहा - इसमें उसका कोई दोष नहीं है। क्योंकि, आने वाले दुर्भाग्य का कारण मित्र भी बन जाता है। जब बछड़े को नीचे बांधना हो तो मां का पैर चौकी का काम करता है।
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