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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 26
ईर्ष्यी घृणी त्वसंतुष्टः क्रोधनो नित्यशङ्कितः । परभाग्योपजीवी च षडेते दुःखभागिनः ॥
जो ईर्ष्या करता है, जो निन्दा करता है, जो सदैव असन्तुष्ट रहता है, जो क्रोधी है और जो सदैव शंकालु रहता है, जो दूसरे के भाग्य पर निर्भर रहता है - इन छः को अपने भाग्य में दुःख ही मिलता है।
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