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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 207
अथवेत्थमेवैतत् । कायः संनिहितापायः संपदः पदमापदाम् । समागमाः सापगमाः सर्वमुत्पादि भङ्गुरम् ॥
या यूं कहें कि ऐसा ही होना चाहिए। शरीर संकटों से ग्रस्त है (अर्थात संकट निकट है), धन दुर्भाग्य का निवास है; और मिलन वियोग के साथ होता है, क्षणभंगुर ही सब कुछ निर्मित होता है।
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