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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 204
स्वाभाविकं तु यन्मित्रं भाग्येनैवाभिजायते । तदकृत्रिमसौहार्दमापत्स्वपि न मुञ्चति ॥
वह स्वाभाविक मित्र जो केवल सौभाग्य से प्राप्त होता है और जिसका स्नेह सच्चा (कृत्रिम नहीं) होता है, विपत्ति में भी उसका साथ नहीं छोड़ता।
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