अपरं च । यद्यदेव हि वाञ्छेत ततो वाञ्छानुवर्तते ।
प्राप्तः एवार्थतः सोऽर्थो यतो वाञ्छा निवर्तते ॥
इसके अलावा मनुष्य जो कुछ भी चाहता है, इच्छा उसी से आगे बढ़ती है (बढ़ती ही जाती है); परन्तु वह वस्तु वास्तव में प्राप्त कही जा सकती है जिससे इच्छा उलट जाती है।
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