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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 160
तावाहतुः -- कथमेतत् । मन्थरः कथयति । ॥ कथा ६ ॥ आसीत् कल्याणकटकवास्तव्यो भैरवो नाम व्याधः । स चैकदा मृगमन्विष्यन् विन्ध्याटवीम् गतः । तेन तत्र व्यापादितं मृगमादाय गच्छता घोराकृतिः शूकरो दृष्टः । ततस्तेन मृगं भूमौ निधाय शूकरः शरेणाहतः । शूकरेणापि घनघोरगर्जनं कृत्वा स व्याधो मुष्कदेशे हतः संश्छिन्नद्रुम इव भूमौ निपपात । यतः । जलमग्निर्विषं शस्तेअं क्षुद् व्याधिः पतनं गिरेः । निमित्तं किंचिद् आसाद्य देही प्राणैर्विमुच्यते ॥
दोनों ने पूछा कि वह कैसा था। मंथरा ने उत्तर दिया - कल्याण प्रांत में भैरव नाम का एक शिकारी रहता था। एक दिन वह हिरण की तलाश में विंध्य वन में गया। जैसे ही वह मारे गए हिरण को लेकर आगे बढ़ा, उसने एक विकराल रूप वाले सूअर को देखा। तब शिकारी ने हिरण को जमीन पर लिटा दिया और सूअर को तीर से घायल कर दिया। सूअर ने भी गहरी और भयानक चीख (या बादलों की गड़गड़ाहट जैसी भयानक चीख) निकाल कर शिकारी की कमर में प्रहार किया, जिससे वह पेड़ की तरह टूटकर गिर पड़ा। जल, अग्नि, विष, हथियार, भूख (भुखमरी), बीमारी या पहाड़ से गिरने जैसे किसी कारण से मिलने पर प्राणी अपने प्राण खो देता है।
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