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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 141
ततोऽहं मन्दं मन्दमुपसर्पस्तेन वीणाकर्णेन जर्जरवंशखण्डेन ताडितोऽचिन्तयम् -- लुब्धो ह्यसंतुष्टो नियतमात्मद्रोही भवति । तथा च । सर्वाः संपत्तयस्तस्य संतुष्टं यस्य मानसम् । उपानद्गूढपादस्य ननु चर्मावृतेव भूः ॥
फिर जैसे ही मैं धीरे से आगे बढ़ा, उस विनाकर्ण ने मुझे एक पुरानी बांस की छड़ी से मारा, जिसके बाद मैंने सोचा - एक लोभी आदमी जो (हमेशा) असंतुष्ट रहता है, वह निश्चित रूप से खुद के प्रति गद्दार होता है। क्योंकि जिसका मन सन्तुष्ट है, उसके लिये सब धन सम्पत्ति है; जिसके पांव जूतों से ढँके रहते हैं, क्या उसके लिये पृय्वी चमड़े से नहीं फैली हुई है?
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