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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 137
अपि च । सेवेव मानमखिलं ज्योत्स्नेव तमो जरेव लावण्यम् । हरिहरकथेव दुरितं गुणशतमप्यर्थिता हरति ॥
जैसे सेवा सारे स्वाभिमान को, चाँदनी अँधेरे को, बुढ़ापे की सुन्दरता को, हरि-हर की कथा को, पाप को नष्ट कर देती है, वैसे ही भिक्षा सौ सद्गुणों को भी नष्ट कर देती है।
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