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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 128
एतत्सर्वमाकर्ण्य मयालोचितम् -- ममात्रावस्थानमयुक्तमिदानीम् । यच्चान्यस्मा एतद्वृत्तान्तकथनं तदप्यनुचितम् । यतः । अर्थनाशं मनस्तापं गृहे दुश्चरितानि च । वञ्चनं चापमानं च मतिमान्न प्रकाशयेत् ॥
यह सब सुनकर मैंने मन में सोचा - अब मेरा यहाँ रहना अनुचित है; और जहां तक मेरा इस बात को दूसरे को बताने का सवाल है तो वह भी उचित नहीं है। बुद्धिमान व्यक्ति को धन की हानि, मानसिक चिन्ता, घर में होने वाले दुष्कर्म, धोखे का शिकार होना तथा अपमान की बात नहीं बतानी चाहिए।
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