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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 126
अन्यच्च । अपुत्रस्य गृहं शून्यं सन्मित्ररहितस्य च । मूर्खस्य च दिशः शून्याः सर्वशून्या दरिद्रता ॥
पुत्रहीन का घर सूना होता है, और जिसका कोई अच्छा मित्र न हो उसका भी घर सूना होता है; मूर्ख के लिये सब कुछ व्यर्थ है, परन्तु दरिद्रता के लिये सब कुछ व्यर्थ है।
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