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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 117
न स्त्रीणामप्रियः कश्चित्प्रियो वापि न विद्यते । गावस्तृणमिवारण्ये प्रार्थयन्ति नवं नवम् ॥
ऐसा कोई नहीं है जो स्त्रियों के लिए अप्रिय हो; और न कोई ऐसा है जिस से उनको प्रेम हो; वे सदैव नये मनुष्य की खोज में रहते हैं, जैसे गायें जंगल में घास चरती हैं।
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