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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 115
सुरूपं पुरुषं दृष्ट्वा भ्रातरं यदि वा सुतम् । किं च । स्थानं नास्ति क्षणं नास्ति प्रार्थयिता नरः । तेन नारद नारीणां सतीत्वमुपजायते ॥
इसके अलावा कोई उपयुक्त स्थान, अवकाश या प्रेमी भी नहीं है। इसी से स्त्रियाँ पवित्र रहती हैं।
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