स च वृद्धपतिस्तयामतीवानुरागवान् । यतः ।
धनाशा जीविताशा च गुर्वी प्राणभृतां सदा ।
वृद्धस्य तरुणी भार्या प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥
हालाँकि, उस बूढ़े पति का उससे बहुत स्नेह था। धन की अभिलाषा और मनुष्यों की जीवन की अभिलाषा सदैव महान रहती है; परन्तु बूढ़े को जवान पत्नी प्राण से भी अधिक प्रिय होती है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हितोपदेश के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
हितोपदेश के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।