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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 105
अपरं च। लोकयात्रा भयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता । पञ्च यत्र न विद्यन्ते न कुर्यात्तत्र संस्थितिम् ॥
इसके अलावा ऐसे देश में नहीं रहना चाहिए जहां इन पांचों की कमी हो, अर्थात् आजीविका, भय (अधिकार का), शर्म की भावना, विनम्रता और दानशीलता।
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