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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 101
मनस्यन्यद्वचस्यन्यत्कर्मण्यन्यद् दुरात्मनाम् । मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम् ॥
नीच मन वाले के मन में एक चीज, वाणी में दुसरी चीज और कर्म में एक तीसरी चीज होती है, जबकि उदार लोगों के मन में एक चीज, वाणी में भी वही और कर्म में भी वही होती है।
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