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हितोपदेश • अध्याय 2 • श्लोक 10
तत्र पूर्वश्चतुर्वर्गो दम्भार्थमपि सेव्यते । उत्तरस्तु चतुर्वर्गो महात्मन्येव तिष्ठति ॥
इनमें से प्रथम चार का अभ्यास दिखावे के लिए भी किया जा सकता है, जबकि अंतिम चार उदारहृदय में ही पाए जाते हैं।
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