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हितोपदेश • अध्याय 1 • श्लोक 35
काकतालीयवत्प्राप्तं दृष्ट्वापि निधिमग्रतः । न स्वयं दैवमादत्ते पुरुषार्थमपेक्षते ॥
किसी आदमी के सामने संयोगवश मिले खजाने को देखकर भी भाग्य उसे अपने ऊपर नहीं लेता, बल्कि अपने हिस्से के मर्दाना प्रयास की अपेक्षा करता है।
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