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हितोपदेश • अध्याय 1 • श्लोक 29
अपि च । यदभावि न तद् आवि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयमगदः किं न पीयते ॥
जो नहीं होना है वह कभी नहीं हो सकता, और यदि होना है तो वह कभी अन्यथा हो ही नहीं सकता - चिन्ता के जहर की यह दवा क्यों नहीं निगली जाती?
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