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हितोपदेश • अध्याय 1 • श्लोक 24
हा हा पुत्रक नाधीतं सुगतैतासु रात्रिषु । तेन त्वं विदुषां मध्ये पङ्के गौरिव सीदसि ॥
अफ़सोस! बेचारे बालक, तुम जो सहज जीवन जीते हो, तुमने इन (पिछली) रातों में ज्ञान प्राप्त नहीं किया, इस कारण तुम्हें ज्ञानियों के समाज में कीचड़ में फंसी हुई गाय के समान दुःख प्राप्त होता है।
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