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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 97
नाद-शरवणतः कष्हिप्रमन्तरङ्ग-भुजङ्गमम | विस्मॄतय सर्वमेकाग्रः कुत्रछिन्नहि धावति ||
मन सर्प के समान है, जो नाद सुनकर अपनी सारी चंचलता भूलकर कहीं नहीं भागता।
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