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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 90
मकरन्दं पिबन्भॄङ्गी गन्धं नापेक्ष्हते यथा | नादासक्तं तथा छित्तं विष्हयान्नहि काङ्क्ष्हते ||
जिस प्रकार मधुमक्खी मधुर रस पीकर फूल की गंध की परवाह नहीं करती; इसलिए नाद में लीन मन भोग की वस्तुओं की इच्छा नहीं करता है।
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