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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 88
घनमुत्सॄज्य वा सूक्ष्ह्मे सूक्ष्ह्ममुत्सॄज्य वा घने | रममाणमपि कष्हिप्तं मनो नान्यत्र छालयेत ||
ऊंचे से ऊंचे स्वर को छोड़कर सूक्ष्म को उठा ले, और सूक्ष्म को छोड़ कर जोर से उठा ले, इस प्रकार अभ्यास करते-करते विचलित मन अन्यत्र नहीं भटकता।
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