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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 86
अन्ते तु किङ्किणी-वंश-वीणा-भरमर-निःस्वनाः | इति नानाविधा नादाः शरूयन्ते देह-मध्यगाः ||
अंतिम अवस्था में, ध्वनियाँ झंकार, बाँसुरी, वीणा, मधुमक्खी आदि से मिलती जुलती हैं। ये विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ शरीर में उत्पन्न होने के रूप में सुनाई देती हैं।
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