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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 82
कर्णौ पिधाय हस्ताभ्यां यः शॄणोति धवनिं मुनिः | तत्र छित्तं सथिरीकुर्याद्यावत्स्थिर-पदं वरजेत ||
मुनि कानों को अंगुलियों से बन्द करके जिस ध्वनि को सुनते हैं, उसे तब तक ध्यानपूर्वक सुनना चाहिए, जब तक मन उसमें स्थिर न हो जाए।
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