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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 75
छित्तानन्दं तदा जित्वा सहजानन्द-सम्भवः | दोष्ह-दुःख-जरा-वयाधि-कष्हुधा-निद्रा-विवर्जितः ||
तब मन के सुखों को जीतकर, अनायास ही आनंद उत्पन्न हो जाता है जो बुराइयों, पीड़ाओं, बुढ़ापा, रोग, भूख और नींद से रहित होता है।
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