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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 6
यदा संक्ष्हीयते पराणो मानसं छ परलीयते | तदा समरसत्वं छ समाधिरभिधीयते ||
जब प्राण क्षीण (ऊर्जाहीन) हो जाते हैं और मन लीन हो जाता है, तो उनका समान होना समाधि कहलाता है।
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