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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 32
उछ्छिन्न-सर्व-सङ्कल्पो निःशेष्हाशेष्ह-छेष्ह्टितः | सवावगम्यो लयः को|अपि जायते वाग-अगोछरः ||
जब समस्त विचार और क्रियाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब लय अवस्था उत्पन्न होती है, जिसका वर्णन करना वाणी से परे है, केवल आत्म-अनुभव से जाना जा सकता है।
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