न गन्धं न रसं रूपं न छ सपर्शं न निःस्वनम |
नात्मानं न परं वेत्ति योगी युक्तः समाधिना ||
समाधि में लगे हुए योगी को न तो गंध, स्वाद, रंग, स्पर्श, ध्वनि का अनुभव होता है और न ही उसे स्वयं का बोध होता है।
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