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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 107
सर्वावस्था-विनिर्मुक्तः सर्व-छिन्ता-विवर्जितः | मॄतवत्तिष्ह्ठते योगी स मुक्तो नात्र संशयः ||
इसमें कोई संदेह नहीं है, ऐसा योगी सभी स्थितियों से मुक्त हो जाता है, सभी चिंताओं से मुक्त हो जाता है और मृत के समान रहता है।
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