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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 106
शङ्ख-दुन्धुभि-नादं छ न शॄणोति कदाछन | काष्ह्ठवज्जायते देह उन्मन्यावस्थया धरुवम ||
ऐसी कोई। शंख और दुंदुभी का शोर सुनाई नहीं देता। उन्मनी अवस्था में होने से उसका शरीर लकड़ी के टुकड़े जैसा हो जाता है।
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