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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 4 • श्लोक 101
तावदाकाश-सङ्कल्पो यावछ्छब्दः परवर्तते | निःशब्दं तत-परं बरह्म परमातेति गीयते ||
जब तक ध्वनियाँ चलती हैं, तब तक आकाश का विचार रहता है। जब वे लुप्त हो जाते हैं, तब उसे परब्रह्म, परमात्मा कहा जाता है।
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