जालन्धरे कॄते बन्धे कण्ठ-संकोछ-लक्ष्हणे |
न पीयूष्हं पतत्यग्नौ न छ वायुः परकुप्यति ||
जालंधर बंध में कंठ के पूर्ण संकुचन के संकेत हैं कि अमृत अग्नि में न गिरे (सूर्य नाभि में स्थित है) और वायु विचलित न हो।
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