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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 3 • श्लोक 69
बिलं परविष्ह्टेव ततो बरह्म-नाड्यं तरं वरजेत | तस्मान्नित्यं मूल-बन्धः कर्तव्यो योगिभिः सदा ||
यह ब्रह्म नाडी में वैसे ही प्रवेश करती है, जैसे सर्प इसके बिल में प्रवेश करता है। अतः योगी को सदैव इस मूलबन्ध का अभ्यास करना चाहिए।
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