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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 3 • श्लोक 42
खेछर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः | न तस्य कष्हरते बिन्दुः कामिन्याः शलेष्हितस्य छ ||
सिद्धों ने इस खेचरी मुद्रा की रचना इस तथ्य से की है कि इसके अभ्यास से मन और जिह्वा आकाश तक पहुँचते हैं।
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