राज-योगं विना पॄथ्वी राज-योगं विना निशा |
राज-योगं विना मुद्रा विछित्रापि न शोभते ||
राजयोग के बिना यह पृथ्वी, रात्रि और मुद्राएँ कितनी ही अद्भुत क्यों न हों, सुन्दर नहीं लगतीं।
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