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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 3 • श्लोक 11
कण्ठे बन्धं समारोप्य धारयेद्वायुमूर्ध्वतः | यथा दण्ड-हतः सर्पो दण्डाकारः परजायते ||
कंठ को रोककर (जालंधर बंध द्वारा) वायु को बाहर से अंदर खींचा जाता है और नीचे ले जाया जाता है। जिस प्रकार डण्डे से मारा हुआ सर्प डण्डे के समान सीधा हो जाता है, उसी प्रकार शक्ति (सुषुम्ना) तुरन्त सीधी हो जाती है।
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