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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 3 • श्लोक 106
येन मार्गेण गन्तव्यं बरह्म-सथानं निरामयम | मुखेनाछ्छाद्य तद्वारं परसुप्ता परमेश्वरी ||
परमेस्वरी (कुंडलिनी) सोती है, मार्ग के उस छिद्र को ढँकती है जिससे व्यक्ति ब्रह्मा के आसन तक जा सकता है जो दर्द से मुक्त है।
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