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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 2 • श्लोक 75
राज-योग-पदं छापि लभते नात्र संशयः | कुम्भकात्कुण्डली-बोधः कुण्डली-बोधतो भवेत | अनर्गला सुष्हुम्णा छ हठ-सिद्धिश्छ जायते ||
वह निस्संदेह राजयोग का पद प्राप्त करता है। कुम्भक द्वारा कुंडलिनी जागृत होती है, और इसके जागरण से सुषुम्ना अशुद्धियों से मुक्त हो जाती है।
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