वायु को बल से भरकर भृंगी की भाँति आवाज करते हुए धीरे-धीरे बाहर निकालकर उसी प्रकार शोर करते हुए; यह अभ्यास योगिन्द्रों के मन में एक प्रकार की परमानंद का कारण बनता है।
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