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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 2 • श्लोक 41
विधिवत्प्राण-संयामैर्नाडी-छक्रे विशोधिते | सुष्हुम्णा-वदनं भित्त्वा सुखाद्विशति मारुतः ||
जब प्राण को ठीक से नियंत्रित करके नाड़ियों का तंत्र अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है, तब वायु सुषुम्णा के प्रवेश द्वार को भेदकर उसमें आसानी से प्रवेश कर जाती है।
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