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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 2 • श्लोक 10
पराणं छेदिडया पिबेन्नियमितं भूयो|अन्यथा रेछयेत पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्ध्वा तयजेद्वामया | सूर्य-छन्द्रमसोरनेन विधिनाभ्यासं सदा तन्वतां शुद्धा नाडि-गणा भवन्ति यमिनां मास-तरयादूर्ध्वतः ||
यदि बायीं नासिका से वायु खींची जाए तो उसे फिर से दूसरी नासिका से बाहर निकाल देनी चाहिए और दायीं नासिका से भरकर वहीं रोककर बायीं नासिका से बाहर निकाल देनी चाहिए। इस प्रकार अभ्यास करने से, बारी-बारी से दाएं और बाएं नथुने से, यमियों (अभ्यास करने वालों) की नाड़ियों का संग्रह 3 महीने और उससे अधिक के बाद शुद्ध हो जाता है, अर्थात अशुद्धियों से मुक्त हो जाता है।
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