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हठयोग प्रदीपिका • अध्याय 1 • श्लोक 66
पुष्ह्टं सुमधुरं सनिग्धं गव्यं धातु-परपोष्हणम | मनोभिलष्हितं योग्यं योगी भोजनमाछरेत ||
चाहे युवा हो, वृद्ध हो, वृद्ध हो, रोगी हो या दुबला, जो आलस्य को त्याग देता है, वह योगाभ्यास करने पर सिद्धि प्राप्त करता है।
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