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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 9
श्रीभगवानुवाच । अहमित्यन्यथाबुद्धिः प्रमत्तस्य यथा हृदि । उत्सर्पति रजो घोरं ततो वैकारिकं मनः ॥
भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने कहा - प्रिय उद्धव! जीव जब अज्ञानवश अपने स्वरूप को भूलकर हृदय से सूक्ष्म-स्थूलादि शरीरों में अहंबुद्धि कर बैठता है - जो कि सर्वथा भ्रम ही है - तब उसका सत्त्वप्रधान मन घोर रजोगुण की ओर झुक जाता है; उससे व्याप्त हो जाता है।
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