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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 7
वेणुसङ्घर्षजो वह्निर्दग्ध्वा शाम्यति तद्वनम् । एवं गुणव्यत्ययजो देहः शाम्यति तत्क्रियः ॥
बाँसों की रगड़ से आग पैदा होती है और वह उनके सारे वन को जलाकर शान्त हो जाती है। वैसे ही यह शरीर गुणों के वैषम्य से उत्पन्न हुआ है। विचार द्वारा मन्थन करने पर इससे ज्ञानाग्नि प्रज्बलित होती है और वह समस्त शरीरों एवं गुणों को भस्म करके स्वयं भी शान्त हो जाती है।
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